श्रीगंगानगर। राधास्वामी संतमत ब्यास के महाराज हजूर जसदीप सिंह जी गिल ने ग्राम लालपुरा स्थित राधास्वामी सत्संग घर में अपने रूहानी सत्संग में स्वामी जी महाराज की वाणी ‘मित्र तेरा कोई नहीं संगियन में, पड़ा क्यों सौवे इन ठगियन मेंÓ पर फरमाया कि हमारा यहां कोई नहीं है, किसको मित्र कहते हैं, जो सफलता-असफलता पर हमारे साथ रहता है। हमारे हित की बात करता है, मार्ग दर्शन देता है। वह सच्चा मित्र है। सभी रिश्तें आते-जाते रहते हैं। आपने फरमाया कि अकेले आये थे अकेले जाना है। हम सोई अवस्था में है। हमारे साथ ना कोई आया था ना किसी ने जाना। पूरी सृष्टि को एक ठग का दर्जा देते हुए ठगों पर फरमाया कि एक ठग प्यार से लूटता, एक ठग बन्दूक की नोक पर लूटता, एक ठग विश्वासघात कर लूटता है। इसलिए हमें भी काम, क्रोध, लोभ मोह अंहकार के 5 ठग लूटने में लगे हैं। यह माया की सृष्टि रची हुई है। हमें असल से दूर किया जा रहा है।
हम अपने बच्चों पर पल-पल पर ध्यान देते हैं। वहीं बड़े होकर हमें दु:खी करते हैं। बाप-बेटे का रिश्ता देख लो, बाप कहता है- बच्चा बड़ा होकर मेरी मदद करेगा? वो इंतजार कर रहा है, बाप वसीयत कब करेगा। यह कोई प्यार नहीं। नई बहू आती है। सास को भी कई आशाएं होती है। जो पूरी नहीं होती, क्या यही प्यार है। यहां सब कुछ नाशवान है।
‘कुड़ राजा कुड़ प्रजा कुड़ सब संसार किसनाल कीजिये दोस्ती सब जग चलन हारÓ
इस शब्द की महिमा पर कहा कि यहां आकाश, हवा, पानी रोगी है। ब्रह्म, विष्णु, महेश सभी रोगी हैं। क्योंकि यह संसार भी रोगी है, जो दिसे बस रोगी हम माया को सच समझें बैठे हैं। हम गंदगी में पैदा हुए, गंदगी खाते हैं, गंदगी में रहते हैं। हमारे 9 द्वारों से भी गदंगी निकलती है। केवल दसवां द्वार उस परमात्मा का मार्ग है।
स्टेज पर कोई राजा की एक्टिंग करता है कोई रानी की, स्टेज से कोई उतरने के बाद ना कोई राजा होता है, ना रानी, ‘यहां ‘राम गयो, रावण गयो, जाकूँ भुव परिवार।। इस पंक्ति का भाव- राम जी जैसे महान अवतार और रावण जैसा शक्तिशाली राजा भी इस संसार से चले गए। जिनके पास बड़ा परिवार, वैभव, सत्ता और अपार शक्ति थी, वे भी यहां सदा के लिए नहीं रह सके। आज हमारे पास धन-दौलत, परिवार, मान-सम्मान और शरीर है, लेकिन एक दिन सब कुछ यहीं छूट जाना हे। जिस चीज को हम अपना समझकर जीवनभर उसके पीछे भागते हैं, वह हमेशा हमारे साथ नहीं रहती। हम सपने में है। हमारे साथ कुछ नहीं जाना। हम अहंकार में नहीं, नम्रता में रहें। संत हमें अकेला बताते हैं, हमारे साथ जो जाएगा वह परमार्थ व नाम तथा मुर्शद, गुरु ही जायेगा। हम उसके साथ रहे, जो अन्त तक साथ जायेगा।
जो सत्संग जाता है, वह सत्संग समझें फिर चले, यह सत्संग राजे, महाराजे की कोई कहानी नहीं, इस पर मोटी-मोटी पौथी लिखी गई है। संतमत में कोई ऐसी चीज नहीं जो हमारे पर लागू ना हो। मालिक ने जिन्दगी सवारनी होती है, वो यहां सुख की सृष्टि संत बनाने नहीं आते।
हमें अंधकार से प्रकाश ले जाने वाला वहीं सच्चा गुरु है। हम सभी सरकारी अफसर की बात मानते हैं।
हफ्ते में 168 घंटे हैं जिसमें 28 घंटे सौ लें, 2 घंटे खाना, माता-पिता की सेवा फिर 100 घंटे बचते हैं उसमें हमें एक घंटा सत्संग यानी एक प्रतिशत (फीसदी) समय सत्संग को देना है, यह हुक्म हमारे लिए पूरा है। 15-16 घंटे हम मन को देते हैं। एक घंटे अपने लिए नहीं दे सकते, रीति रिवाज के लिए हम भाग पड़ते हैं। सत्संग के फायदे बड़े हैं। सत्संग हमें दुनिया की धूप से बचाता है। सत्संग हमें सुरक्षित रखता है। हमें भी वही कदम बढ़ाने हैं जहां सत्संग हो, जो सत्संग में जायेगा जहां कुल मालिक व नाम की महिमा वहां गाई जाती है, वहां पूरा संत मार्ग दर्शन देगा। सत्संग में जो समझाया जाता है उस पर अमल करें और कहीं कुछ मिलने वाला नहीं।
आपने फरमाया आज रूहानियत की परख अच्छे अभ्यास से जोड़ रहे हैं। सत्संग में हमें जो रास्ता बताया जाता है उस पर चलना है। जब तक हम सत्संग पर अमल नहीं करेंगे तब तक कोई फायदा नहीं।
नाम क्या है, इसकी स्पष्टता क्या है? यह कोई अक्षर नहीं, वह पूरी सृष्टि का चालक है। उसे कोई वाहेगुरु, परमात्मा कहता है। कुल नाम वो कण-कण, पत्ते-पत्ते में है।
”घट घट जो बसे संतन करे विचारÓÓ
हमने उस एक परमात्मा के 11 सौ नाम रख दिये। कोट नाम संसार में है, इससे मुक्ति नहीं। आदिनाम जो गुप्त है, वो सच्चा है, जो गुप्त नाम को विरला ही उसे समझ कर जप करता है वही, उसे पा लेता है। नाम अक्षर नहीं, यह नाम ने खंड ब्रह्मांड की रचना की है। नाम एक करतारी ताकत, एक ज्योत है, एक धुन है, एक बाणी है, वो ज्योत धुन नाम हमारे अंदर गुंज रहा है जिसकी चाबी पूरे गुरु के पास है।
बाणी हमारे आपके सबके अंदर है। उदाहरण मंदिर में चले जाओ वहां ज्योत जल रही है। मस्जिद में चले जाओ वहां दीया जल रहा है। मौलवी आवाज लगा रहा है। गुरुद्वारे में चले जाओ वहां शंख बजता है। प्रकाश होता है। गिरजा घर में कैंडल जलाई जाती है। यह सब जो बाहर की चीजें हैं, हमें अंदर के लिए बनाई गई हैं।
गुरु का सत्संग हमें धर्म दर्शन देता है। सही मार्ग दिखाता है।
आज हमारा वजूद धन दौलत पद से जुड़ा है। लेन-देन कारोबार, सौदा करते हैं तो धन चाहिए वो लेन-देन में है। यह धन रिश्तेदार यहीं के है। आज के विवाह में चरित्र असूल तथा हक हलाल की कमाई जैसी बात कोई नहीं पूछता? पहले थोड़ा देते हैं। फिर और देते हैं। फिर जब चर्चा होती है। आपने पहले क्या देखा?
अपने परमात्मा की तरफ इशारा करते हुए कहा कि हम 100 रुपए चढ़ाते हैं। लाखों-करोड़ों मांगते हैं। कभी कोठियां मांगते हैं, कभी कारें मांगते हैं। ईश्वर जो दे सकता है, वह जानता नहीं, इसको क्या चाहिये, क्या नहीं। आज पति-पत्नी के सौदे हैं। हम कितना कमाते हैं, मालिक ने जो हमें बक्शा था, उसे हम एक-दूसरे का सहारा बनें, मदद करें।
हम कितना भी बटोर ले खानी तो 2 वक्त की रोटी है। यहां राजा-महाराजे आए, खाली हाथ आए, खाली हाथ चले गए। पैसा आ आए तो उसे अच्छे रास्ते पर जरूर लगायें। परिवार की बेहतरीन चाहते हो तो उसूलों से चले, देखा-देखी में ना चले, दूसरों की सुविधा देखकर अपना न गंवाओ। परमात्मा से बार-बार मांगने से अच्छा कर्म करो।
आज हम भिखारी हैं, हमारे हाथ मांगते हैं। संत युगों-युगों से देते आए हैं, वो देता-देता नहीं थका हम लेते-लेते नहीं थके। ये देही फिर हाथ नहीं आती, यह मनुष्य जन्म अनमोल है। जैसे पेड़ से गिरा पत्ता दूबारा नहीं लग सकता। इसी तरह इंसान का जन्म फिर नहीं मिलता। 84 लाख योनियों में धक्के खाने पड़ेंगे। हम पेड़ी के आखिरी डंडे पर खड़े हैं। कोशिश करेंगे नाम की कमाई करेंगे तो ऊपर आ जायेंगे। नहीं तो 84 तैयार है। बाद में दु:खों की जिन्दगी है। उत्तमता है इस जामे की, जिसमें बैठकर हम ज्ञान रत्न प्रगट करें।
इस देही में देवी देवता को भी जन्म लेना पड़ता है। क्योंकि इस परमात्मा को पाने हेतु इस काया में वो खुद बैठा है।
आज हम शराब पीते हैं, नशा खून में चढ़ रहा है। पेट भरने के लिए हम जानवरों को मार कर पेट भर रहे हैं। इस अवस्था में हम भक्ति कैसे करेंगे? आंखें कितनी चीजें देख रही हैं यही हमारा हाल है। हर मंदिर यह शरीर है। यह हरमंदिर है, तो इसका कोई मकसद होगा। गोविंद से मिलने का मौका मिला है। इस मालिक से मिलने का, नहीं तो आगे अंधेरा ही अंधेरा है। जो करना है आज करे, पल-पल मत गुज़ारे। हमारी आशायें इतनी है कि जो खत्म नहीं होती। मौत दरवाजा खट खटा रही है। मुंह में खाने की बुर्की जानी है कि नहीं हमें पता नहीं।
”मिली नर देह तुम को काज करो कुछ दिन मेंÓÓ
84 लाख योनियों में हमें मौका मिला है। इसका फायदा उठाये। हमारी अवस्था पर आपने ध्यान दिया। उन्होंने हमें 84 से बाहर निकलने की बात की है। गुरु बिन तेरा और ना कोई। धार बचन मन में, हम सोचते हैं कि हमें गुरु की जरूरत नहीं? पहला गुरु मां-बाप होता है, फिर वह उंगली पकड़ कर स्कूल में भेजता है। वहां गुरु शिक्षा देता, फिर सबक सीखता है। काम-काज में हम बॉस से सीखते हैं। आध्यात्मिकता पर कोई सोचता नहीं। पत्थर बोल नहीं सकते। देवी देवता हमने देखे नहीं। ‘जानवरों की बोली हमें समझ में नहीं आती। वही परमात्मा स्वयं हमारे में अपना जैसा बनकर आते हैं, इंसानी जामे में आते हैं। हम उन्हें पहचानते नहीं।
संत महात्मा आते हैं। वो वक्तनुसार आते हैं। हमें दर्शन देकर मालिक का रास्ता दिखाते हैं। फिर मालिक में ही चले जाते हैं। बाणी समझाती है अपनी मेहनत से काम करें ऐसे संत के पीछे लगें, जो मांगता नहीं, कुछ लेता नहीं, वह तो सिर्फ नाम का रास्ता दिखाते हैं। हमें उनका पल्ला पकडऩा है, जो सही रास्ता दिखाए। जो घर बैठे ही उत्तम मार्ग दिखता है, वो नाम की पूजा करता है।
हम अज्ञानता में कैसे हैं, हम पर जन्मों-जन्मों की मैल इक_ी हुई पड़ी है, जो बिना नाम के साफ नहीं होगी। अब मौका मिला है, जन्मों-जन्मों की मल नाम से धोकर जाने का।
आपने अन्त में समझाया कि मुक्ति भजन सुमिरन से मिलेगी, जो सिमरन हमें मिला है, उसे अपने अन्दर बिठायें, फिर चलो गगन में, अगर हम रूहानी मण्डलों में चले नहीं, तो इस सृष्टि में आकर बार-बार जन्म लेना पड़ेगा। फिर देरी मत करो। अनमोल वक्त मिला है।
‘यूं समझये कहे राधास्वामी मानो एक बचन मेंÓ
आपके प्रवचनों में स्वामी जी महाराज, महाराज चरण सिंह जी, रामायण महाभारत, नौवी पातशाही,कबीर साहब के उदाहरण पेश कर हमें एक घंटा 7 मिनट तक समझाया, जो समझ गया वो मालिक के करीब पहुंचेगा वरना 84 तैयार है।
आपने सत्संग के बाद 17 अक्टूबर को खुली कार में संगत को लालपुरा सेंटर में दर्शन दिये। कार में हजूर श्री जसदीप सिंह जी गिल विराजमान थे। इस अवसर पर सवाल-जवाब भी हुए। इसके अगले दिन 18 अक्टूबर को प्रात: साढ़े 9 बजे आपने रूहानी सत्संग द्वारा संगत को निहाल किया। इस कार्यक्रम में नामदान भी सम्मिलित था, जिसके लिए रजिस्ट्रेशन पहले किया गया। तपरान्त 18 अक्टूबर को नामदान की बख्शीश की।
ट्रैफिक, विशाल लंगर, मेडिकल, कैंटीन इत्यादि की उत्तम व्यवस्था की गई। इस सत्संग को सुनने के लिए हर बार की तरह राजस्थान, पंजाब, हरियाणा व अन्य इलाकों से भारी तादाद में संगत पहुंची।
हजूर साहब ने श्रीगंगानगर की संगत की झोलियां भरते हुए अगामी रूहानी सत्संग मई 2027 में करना तय कर दिया है। सेवादार इस तैयारियों में खुशी से जुट गए हैं।














