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श्री राम कथा – प्रथम दिवस

मुरलीधर प्रजापत श्री सालासर बालाजी धाम, जिला–चूरू (राजस्थान) में “अवधेशानन्दजी मिशन” एवं “प्रभु प्रेमी संघ चैरिटेबल ट्रस्ट” के पावन तत्वावधान में आद्यकवि महर्षि वाल्मीकि विरचित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण पर आधारित “श्रीराम कथा” का दिव्य आध्यात्मिक अनुष्ठान अत्यंत श्रद्धाभाव और उत्सव के परम उत्साह के साथ आरम्भ हुआ।

इस श्रीराम कथा महायज्ञ के “प्रथम दिवस” पर श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर

पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज (पूज्य आचार्यश्री) के श्रीमुख से निःसृत अमृतवाणी ने श्रोताओं के हृदय को गहन आध्यात्मिक अनुभूति से भाव विभोर कर दिया।

 

पूज्य आचार्यश्री ने उद्घोष किया – “रामो विग्रहवान् धर्मः”.. भगवान श्रीराम मर्यादा, संयम और धर्म के साकार स्वरूप हैं। वे भारत के प्रभात के प्रथम स्वर, जीवन के परम आदर्श तथा कर्तव्य, आचरण और आदर्श के जीवन्त प्रतिमान हैं। श्रीराम सनातन संस्कृति के सर्वोच्च मानदण्ड हैं, जहाँ धर्म केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का सहज आचरण बन जाता है।

 

महादेव के स्वरूप का विवेचन करते हुए “पूज्य आचार्यश्री” ने कहा कि भगवान शिव ईशान, अघोर, देवसाक्षी, कर्मसाक्षी, युगसाक्षी और ईशसाक्षी हैं। वही महादेव हनुमान रूप में, “किं पुरुष” बनकर, सेवक भाव से भगवान की सेवा में अवतरित होते हैं ; यह भक्ति और करुणा का परम आदर्श है।

 

वेद-विचार पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि गायत्री वेदों का सार है। वेद श्रवण की परम्परा है, इसीलिए वेद सन्त-सत्पुरुषों के सान्निध्य में सुने जाते हैं। जीवन में सन्त का आगमन समस्त परिस्थितियों को अनुकूल बना देता है। सत्य के बिना न धन आता है, न ऐश्वर्य, न लक्ष्मी का वास होता है। सत्य का अनुसरण ही श्री-प्राप्ति का मूल है।

 

प्रणाम को हमारी संस्कृति की महान साधना बताते हुए “पूज्य आचार्यश्री” ने विनय के महत्व पर बल दिया। करसा, उरसा, सिरसा, मनसा, वाचसा, आत्म-प्रणाम और साष्टांग प्रणाम की विविध विधियाँ सद्गुरु सिखाते हैं। नित्य माता-पिता, गुरु और ज्येष्ठजनों को प्रणाम करने से आयु, विद्या, यश और बल की प्राप्ति होती है; विनय से बड़ा कोई साधन नहीं।

 

सन्त, गुरु और ग्रन्थ के निकट बैठने से जीवन में प्रकाश आता है। श्रवण और मनन से सत्य का बोध होता है। उन्होंने स्मरण कराया कि सबसे कठिन साधना भगवन्नाम-स्मरण और मंत्र-जप है, क्योंकि मन व्यर्थ की बातों, निन्दा और सांसारिक प्रपंचों में उलझा रहता है। अतः अहर्निश जिह्वा से हरिनाम का जप करते रहना ही मुक्ति का सरल मार्ग है।

 

आनन्द-तत्त्व की व्याख्या करते हुए “पूज्य आचार्यश्री” ने कहा कि हमारी सत्ता मूलतः आनन्दस्वरूप है। इसीलिए ब्रह्म को ‘आनन्द’ कहा गया है। भौतिक उपलब्धियाँ क्षणिक सुख देती हैं, पर पूर्ण आनन्द का बोध केवल सच्चिदानन्द से सम्भव है। शुभ विचारों और सद्संकल्पों से मन का रूपांतरण ही सच्ची सफलता का द्वार खोलता है।

 

“राम जनम के हेतु अनेका…” भगवान के अवतार के अनेक कारणों का वर्णन करते हुए उन्होंने जगत को माया का भ्रम बताया। जो कुछ भी दृष्टिगोचर है, वह भगवान की माया है, जो अनित्य और अपूर्ण है। परमात्मा नित्य, पूर्ण, पूर्णकाम, आप्तकाम और निष्काम हैं। देवर्षि नारद के माया-मोह प्रसंग के माध्यम से “पूज्य आचार्यश्री” ने माया की शक्ति और उससे उबरने के विवेक का अत्यन्त प्रभावशाली निरूपण किया। इसी के साथ प्रथम दिवस की कथा श्रद्धा और वैराग्य के भाव में सम्पन्न हुई।

 

इस पावन अवसर पर श्रीराम कथा की मुख्य यजमान आदरणीया श्रीमती सीमा प्रभु जी, श्री सालासर धाम के सम्मानित पुजारीगण; श्री मिट्ठू जी, श्री काबर जी, श्री यशोदानन्दन जी, श्री रविशंकर जी, श्री सत्यप्रकाश जी, श्री अरविन्द जी, श्री किशन जी, प्रभु प्रेमी संघ के प्रमुख न्यासीगण, शासन-प्रशासन के अधिकारीगण तथा देश-विदेश से पधारे असंख्य श्रद्धालु एवं सन्तजन उपस्थित रहे।

 

जय श्रीराम !!

 

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