माइक थामते ही पत्रकार नहीं बन जाता कोई: फर्जी पत्रकारिता के बढ़ते चलन ने खड़े किए गंभीर सवाल
रमेश भार्गव की
विशेष रिपोर्ट
आज के डिजिटल युग में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के विस्तार ने जहां अभिव्यक्ति के नए अवसर दिए हैं, वहीं पत्रकारिता के नाम पर बढ़ती अव्यवस्था ने भी कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। स्थिति यह है कि आज हर तीसरा व्यक्ति हाथ में 300 से 1000 रुपये का माइक लेकर, उस पर किसी तथाकथित “लाइव”, “न्यूज़” या “चैनल” का नाम चिपकाकर स्वयं को पत्रकार घोषित कर रहा है।
पत्रकारिता एक जिम्मेदारी, अनुशासन और जनहित से जुड़ा पेशा है। यह केवल माइक या कैमरा पकड़ लेने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की पड़ताल, निष्पक्षता, सामाजिक सरोकार और जवाबदेही का कार्य है। लेकिन वर्तमान में कई ऐसे लोग भी इस क्षेत्र में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं जिनका पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। इससे वास्तविक और समर्पित पत्रकारों की साख पर भी असर पड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कोई भी व्यक्ति बिना किसी प्रशिक्षण, पंजीकरण या संस्थागत पहचान के स्वयं को पत्रकार कैसे घोषित कर सकता है? आम जनता के लिए भी असली और नकली पत्रकार के बीच अंतर करना मुश्किल होता जा रहा है। कई बार ऐसे लोग पत्रकारिता की आड़ में निजी स्वार्थ साधने, दबाव बनाने या सामाजिक भ्रम फैलाने का काम करते हुए भी देखे जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पत्रकारिता की गरिमा बनाए रखने के लिए मीडिया संस्थानों, प्रेस संगठनों और संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना होगा। साथ ही आम नागरिकों को भी यह समझना होगा कि पत्रकार की पहचान केवल माइक, कैमरा या सोशल मीडिया पेज से नहीं होती, बल्कि उसकी विश्वसनीयता, कार्यशैली और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता के नाम पर फैल रही अव्यवस्था पर प्रभावी नियंत्रण हो तथा वास्तविक पत्रकारों और तथाकथित पत्रकारों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया जाए। क्योंकि जब पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगता है, तब केवल एक पेशा ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी प्रभावित होता है।
पत्रकारिता अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; और उत्तरदायित्व की पहचान माइक से नहीं, कर्म से होती है।
पत्रकार कैसे बनते हैं?
किसी मान्यता प्राप्त समाचार पत्र, न्यूज़ पोर्टल, टीवी चैनल या मीडिया संस्थान से जुड़े होने पर संस्थान अपना आईडी कार्ड जारी करता है।
सरकार द्वारा समय-समय पर पत्रकारों को अधिस्वीकृति (Accreditation) दी जा सकती है, लेकिन यह लाइसेंस नहीं है।
पत्रकारिता की पढ़ाई करना भी अनिवार्य नहीं है, हालांकि इससे पेशेवर योग्यता बढ़ती है।
यूट्यूब या ऑनलाइन न्यूज़ चैनल
कोई भी व्यक्ति youtube.com� पर चैनल बनाकर समाचार या वीडियो प्रकाशित कर सकता है।
इसके लिए अलग से “पत्रकार लाइसेंस” की आवश्यकता नहीं होती।
लेकिन मानहानि, फेक न्यूज़, कॉपीराइट और अन्य कानूनों का पालन करना जरूरी है।
टीवी न्यूज़ चैनल
टीवी समाचार चैनल शुरू करने के लिए केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा अन्य नियामकीय प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है।
यह प्रक्रिया व्यक्तिगत पत्रकार के लाइसेंस से अलग है।
कौन कार्रवाई कर सकता है?

यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की आड़ में धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग, फर्जी पहचान या अवैध वसूली करता है, तो उसके खिलाफ पुलिस और संबंधित प्रशासनिक अधिकारी कार्रवाई कर सकते हैं। केवल माइक पर “न्यूज़” या “लाइव” लिखवा लेने से कोई व्यक्ति अधिकृत पत्रकार नहीं बन जाता।
संक्षेप में: भारत में “पत्रकार लाइसेंस” नहीं बनता। पत्रकार की पहचान उसके मीडिया संस्थान, कार्य और विश्वसनीयता से होती है, न कि केवल माइक या आईडी कार्ड से।

