-राजस्थान के पंचायत चुनावों में ऐसे जन प्रतिनिधि चुनने की जरूरत है, जो नेतृत्व, शिक्षा और आत्म निर्भरता की कसौटी पर खरे उतरें
कर्नल (डॉ.) बलदेव सिंह चौधरी ‘मानव’
राजस्थान में पंचायती राज चुनावों की प्रक्रिया चल रही है। ये चुनाव महज सरपंच-पंच चुनने की कवायद नहीं बल्कि यह तय करने का अवसर भी है कि आने वाले पांच साल में गांव किस दिशा में आगे बढ़ेंगे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हम जिन्हें अपना प्रतिनिधि चुनेंगे, वे गांव को किस दिशा में ले जाएंगे? क्या उनका विकास संबंधी नजरिया सडक़, नाली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं तक सीमित रहेगा या वे शिक्षा, रोजगार, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक समरसता और पर्यावरण संरक्षण को भी विकास का हिस्सा बनाएंगे? क्या वे गांव को केवल सरकारी योजनाओं का लाभार्थी बनाए रखेंगे या उसे आत्म निर्भर बनाने की दिशा में भी काम करेंगे?
हम अक्सर आदर्श सरपंच की जरूरत की बात करते हैं। लेकिन आदर्श सरपंच वह नहीं, जो केवल विकास कार्य करवा दे। आदर्श सरपंच से अपेक्षा है कि वह गांव की सामूहिक ताकत को पहचाने, लोगों को साथ लेकर चले और आने वाली पीढिय़ों के लिए बेहतर भविष्य की नींव रखे। ऐसे नेतृत्व से ही उत्तम गांव और उत्तम गांवों से श्रेष्ठ भारत का सपना साकार हो सकता है।
मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मेरा जन्म गांव में हुआ। वहीं पला-बढ़ा और वहीं शिक्षा हासिल की। अपने पिता और परिवार को कठिनाइयों से जूझते देखा। दूर-दराज के गांवों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीवन कितना कठिन होता है, यह मैंने किताबों में नहीं पढ़ा बल्कि अपने जीवन में महसूस किया है। मैंने गाँवों को संकटों से जूझते भी देखा है और अपनी जीवटता के बल पर उनसे उबरते भी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद ग्रामीण अपने श्रम, सहयोग और संघर्ष से फिर खड़े हो जाते हैं। मैं गांवों में आमूलचूल बदलाव का पक्षधर हूं। सरकारी योजनाएं ग्रामीण विकास के लिए जरूरी हैं लेकिन मैं नहीं चाहता कि कि गांव केवल योजनाओं के निष्क्रिय लाभार्थी बनकर रह जाएं। पंचायतों को स्थानीय संसाधनों, प्रतिभा और सामूहिक प्रयासों के आधार पर गांवों को आत्म निर्भर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ें, किसान मजबूत हों, युवा अपनी प्रतिभा का उपयोग कर सकें और पलायन मजबूरी न रहे। यही ग्रामीण विकास की वास्तविक कसौटी है।
मेरी नजर में गांव के विकास में शिक्षा से बढक़र कुछ नहीं है। शिक्षा के सहारे ही हम ग्रामीण समाज की अनेक समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं। अंध विश्वास, सामाजिक पिछड़ापन और अनेक कुरीतियों के बने रहने के पीछे अशिक्षा के साथ-साथ सामाजिक दबाव और पुरानी रूढिय़ों की भी भूमिका है। मैंने अपने परिवार और समाज में मृत्युभोज जैसी कुप्रथा के कारण लोगों को आर्थिक रूप से टूटते देखा है। सामाजिक दबाव में परिवार इस आयोजन के लिए पैसा जुटाते हैं, कर्ज लेते हैं और कभी-कभी बच्चों की पढ़ाई तथा उनके भविष्य को भी दांव पर लगा देते हैं। यह पीड़ादायक है कि जिस धन का उपयोग बच्चों की शिक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में हो सकता है, वह सामाजिक दबाव में खर्च हो जाता है। जागरूकता बढऩे से मृत्युभोज जैसी कुरीतियों में कमी आई है लेकिन जब जातीय पंचायतों के दबाव में परिवारों को ऐसे आयोजन करने के लिए मजबूर किए जाने की खबरें मिलती हैं तो मन में टीस उठती है। आने वाले चुनावों में चुने जाने वाले सरपंचों से अपेक्षा है कि वे ऐसी कुरीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक करें और उन फैसलों का विरोध करें, जो किसी परिवार को उसकी इच्छा के विरुद्ध खर्च करने या कर्ज लेने के लिए बाध्य करते हैं।
गांवों का विकास नारों से नहीं हो सकता। इसके लिए धरातल पर काम करना होगा। पंचायतें गांवों में पुस्तकालय और अध्ययन केंद्र विकसित करने, विद्यालयों की सुविधाएं सुधारने तथा जरूरतमंद विद्यार्थियों की मदद करने में भूमिका निभा सकती हैं। शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं बल्कि विवेक और आत्मसम्मान विकसित करने का माध्यम भी है। संविधान नागरिकों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और सुधार की भावना विकसित करने की अपेक्षा करता है। पंचायतें विज्ञान गतिविधियों, डिजिटल साक्षरता और नवाचार को बढ़ावा देकर इस दिशा में योगदान दे सकती हैं। आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसके नाम पर शोषण और भेदभाव को स्वीकार नहीं किया जा सकता।्र
युवाओं के विकास के लिए खेल मैदान, खेल क्लब और कौशल प्रशिक्षण जरूरी हैं। खेलों से उनमें अनुशासन और टीम भावना विकसित होती है। कृषि प्रसंस्करण, डेयरी, पशुपालन, सौर ऊर्जा, डिजिटल सेवाओं और हस्तशिल्प से जुड़े प्रशिक्षण युवाओं को गांव में ही रोजगार के अवसर तलाशने में मदद कर सकते हैं। पंचायतों को स्थानीय संस्थानों और सरकारी योजनाओं से समन्वय कर ऐसे अवसर उपलब्ध कराने की पहल करनी चाहिए। खेती, पशुपालन और परिवार की जिम्मेदारियों में महिलाओं का योगदान ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। पंचायतों को उनके लिए आजीविका, प्रशिक्षण और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी के अवसर बढ़ाने चाहिए। साथ ही सरपंच को जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ खड़ा होना चाहिए तथा महिलाओं, कमजोर वर्गों और वंचित परिवारों की बात सुननी चाहिए। गांव का विकास तभी सार्थक होगा, जब उसमें सभी की भागीदारी और सम्मान सुनिश्चित हो।
जल संरक्षण और पर्यावरण की रक्षा गांवों के भविष्य से जुड़े सवाल हैं। पंचायतें वर्षा जल संचयन, तालाबों की देखभाल, भूजल संरक्षण और पौधों को बचाने के लिए सामूहिक पहल कर सकती हैं। काम की सफलता केवल खर्च हुई राशि से नहीं, बल्कि जमीन पर आए बदलाव से आंकी जानी चाहिए। पंचायती राज की असली ताकत ग्राम सभा है। विकास की प्राथमिकताएं तय करने में ग्रामीणों की राय ली जानी चाहिए और पंचायत के बजट, स्वीकृत कार्यों तथा खर्च का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। ग्राम सभा केवल औपचारिक बैठक न बने बल्कि लोगों को सवाल पूछने और फैसलों में भागीदारी का वास्तविक अवसर मिले।
नए सरपंच तो अभी चुने जाएंगे, उनकी जिम्मेदारी तो बाद में तय होगी। उससे पहले मतदाताओं को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। सरपंच चुनते समय उम्मीदवार की जाति, लोकप्रियता या वादों से आगे जाकर उसकी ईमानदारी, कार्यक्षमता और विकास संबंधी सोच को देखना होगा। जो लोग वोट मांगने आ रहे हैं, क्या उनके पास गांव के लिए कोई व्यावहारिक योजना है? क्या वे युवाओं, महिलाओं, किसानों और कमजोर परिवारों को साथ लेकर चलने की सोच रखते हैं? हम कई बार कम पढ़े-लिखे व्यक्ति को कमतर आंक लेते हैं और डिग्रीधारी व्यक्ति से बहुत उम्मीदें लगा लेते हैं। लेकिन किसी की शैक्षणिक योग्यता ही उसके नेतृत्व की पूरी कसौटी नहीं हो सकती। गांव के अनुभव, लोगों के बीच उसकी विश्वसनीयता, ईमानदारी, प्रशासनिक समझ और सीखने की इच्छा भी महत्वपूर्ण हैं। मतदाता को व्यक्ति की डिग्री से अधिक उसके व्यवहार, सोच और काम करने की क्षमता को परखना चाहिए।
हम विकसित भारत की बात करते नहीं थकते। लेकिन क्या गाँवों के विकास के बिना यह सपना पूरा हो सकता है? गाँवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण की स्थिति सुधरेगी, तभी विकसित भारत की नींव मजबूत होगी। इसके लिए सरकारी सहायता के साथ स्थानीय भागीदारी और सामूहिक जिम्मेदारी भी जरूरी है। सरपंचों को ऐसी व्यवस्थाएँ बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जो उनके कार्यकाल के बाद भी गाँव के काम आती रहें।
सवाल उठता है कि हम आखिर आदर्श सरपंच किसे कहेंगे? उसे, जो लंबे-लंबे भाषण दे, या उसे जो गांव को अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश करे? ऐसा गांव, जहां स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर हों, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा हो और लोग केवल रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर छोडऩे को मजबूर न हों। जो जन प्रतिनिधि इस दिशा में काम करेगा, वही आदर्श सरपंच कहलाने का हकदार होगा। उसका गांव उत्तम गांव बनेगा और ऐसे ही गांव मिलकर श्रेष्ठ तथा विकसित भारत की नींव रखेंगे।
(लेखक शेरगढ़ (राजस्थान) में जिला सैनिक कल्याण अधिकारी हैं। वह सामाजिक जागरूकता और युवा सशक्तीकरण के क्षेत्र में सक्रिय हैं।)














