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दलित व्यक्ति को फंसाने का प्रयास, पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

हनुमानगढ़। डॉ. अंबेडकर नवयुवक संघ के प्रवक्ता जसविंदर धालीवाल ने मंगलवार को एक प्रेस वार्ता में पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि पुलिस अधिकारियों ने संगरिया तहसील के गांव हरिपुरा में डोडा पोस्त और नकद राशि की बरामदगी को लेकर दलित समाज के व्यक्ति महावीर प्रसाद मेघवाल को झूठे मुकदमे में फंसाने का प्रयास किया है।
धालीवाल के अनुसार, 27 मार्च 2024 को सुबह 4 बजे हरचंद सिंह और इंद्रजीत सिंह के खेत में बनी ढाणियों से 6 क्विंटल 30 किलो डोडा पोस्त और 30 लाख 30 हजार रुपए नकद पुलिस द्वारा बरामद किए गए थे। इन वस्तुओं को पवन चुघ नामक चालक की पिकअप गाड़ी में लादकर संगरिया थाने ले जाया गया और 192 नंबर का मुकदमा एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज किया गया। पुलिस ने इस बरामदगी का आरोप रामचंद्र उर्फ रामू बावरी पर लगाया, लेकिन आरोप है कि बड़े प्रलोभन में आकर पुलिस ने बरामदगी का स्थान बदलकर दलित समाज के महावीर प्रसाद मेघवाल के खेत में दिखा दिया।
धालीवाल ने कहा कि बरामदगी वाली असली जगह और महावीर प्रसाद के खेत के बीच करीब 5-6 किलोमीटर की दूरी है। पुलिस ने प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए महावीर प्रसाद को मामले में फंसाने का प्रयास किया है। इस संदर्भ में वीडियो और अन्य सबूत भी मौजूद हैं, जो सच्चाई उजागर करते हैं।
आरोप है कि पुलिस ने रामू बावरी और अन्य प्रभावशाली लोगों से मोटी रिश्वत लेकर उन्हें बचाया। रामू के घर से बरामद स्कॉर्पियो, वरना कार और चोरी की पिकअप गाड़ी को भी रिश्वत के बदले छोड़ दिया गया। इसके अलावा, पुलिस अधिकारियों पर महावीर प्रसाद को फंसाने के लिए साजिश रचने का भी आरोप लगाया गया।
इस घटना को लेकर सर्व समाज में भारी आक्रोश है। समाज के लोगों ने एसपी हनुमानगढ़, आईजी बीकानेर और डीजीपी राजस्थान से मांग की है कि इस मामले की जांच के लिए विशेष कमेटी गठित की जाए और दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। साथ ही, महावीर प्रसाद को झूठे मामले में फंसाने का प्रयास रोकने की अपील की गई है।
प्रवक्ता ने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की गई, तो सर्व समाज एसपी कार्यालय के सामने आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन की पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
धालीवाल ने कहा कि यह घटना पुलिस की कार्यप्रणाली और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। दलित समाज के व्यक्ति को झूठे मामले में फंसाने का यह प्रयास न केवल निंदनीय है, बल्कि समाज में असमानता और अन्याय को भी उजागर करता है।

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